रविवार, 8 जनवरी 2017

कुछ लफ्ज़ो की कहानी

मैं मध्य रात्रि के आखिरी पहर मे
तुम्हारी याद के आगोश में लिपटी
अकेली पड़ी हॅू
बारिश की हल्की बूंदों से
यादों का धुंधलापन साफ हो गया

मैं विरह में नहीं
मीठे अहसास से नहा कर निकली
काश!...
तुम मेरे पास होते
मेरे अधरों पर अधर रखकर चूमते मुझे
और मैं मध्यम स्वर में
 तुम्हारे कान के पास कुछ कहती
नींद की बेहोशी का बहाना करके
तुम्हारे  और करीब आती
हमारे बीच सिर्फ दो जिस्मों का व्यवधान बचता
काश!
मैं तुम्हारे ‘हाँ’और ‘न’ समर्थन वैसे ही करती
जैसे तुम करते हो समर्थन
अपने  पुरूषत्व का